जज लोया की मौत पर कानूनी दावपेंच जारी! सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई रिव्यू पिटीशन

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आपको बता दें कि पिछले 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत की जांच की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा ता कि न्यायिक अधिकारियों पर भरोसा नहीं करने का कोई कारण नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे ने न्यायिक अधिकारियों की तरफ असंबद्ध वजहों से इशारा किया था जिसका कोई संबंध नहीं था। याचिकाकर्ताओं ने न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की कोशिश की। व्यापारिक और राजनीतिक विवाद बाहर निपटाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने ये बताने की कोशिश की थी कि याचिका जांच के लिए है लेकिन यह न्यायपालिका के खिलाफ था। सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत को स्वाभाविक मौत बताया था।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने ये फैसला सुनाया था। सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने कहा था कि याचिकाकर्ताओं का एक मात्र उद्देश्य एक व्यक्ति को टारगेट करना है। महाराष्ट्र सरकार के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा था कि इंटेलिजेंस के महानिदेशक ने इस मामले की जांच की थी। उन्होंने कहा था कि एंटी करप्शन और इंटेलिजेंस दोनों ने समानांतर जांच की। उन्होंने दलील दी थी कि महत्वपूर्ण मामले की जांच इतना महत्वपूर्ण तरीके से किया गया कि दूसरे व्यक्ति को पता तक नहीं चला।
रोहतगी ने कहा था कि बयानों में अंतर का कोई महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण ये है कि जज लोया की मौत हार्ट अटैक से हुई। हम इस पर चर्चा नहीं कर रहे हैं कि क्या होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि कारवां मैगजीन गैरजिम्मेदार है।
मैगजीन कहती है कि उन्होंने एक जज से मुलाकात की जो जज लोया के साथ मौजूद था। लेकिन याचिकाकर्ताओं उनके साथ रहने पर सवाल उठा रहे हैं। याचिकाकर्ता केवल एक व्यक्ति को टारगेट कर रहे हैं। रोहतगी ने कहा था कि दुष्यंत दवे ने चार जजों के क्रास-एग्जामिनेशन की मांग की। ये मांग विनाशकारी है। हम किस पर भरोसा करें। कारवां रिपोर्ट पर या जज पर जिनके पास कार थी और वे जज लोया को अस्पताल ले गए। जज डॉक्टर नहीं होते। उस समय उन्होंने तात्कालिक फैसला किया। ये महत्वपूर्ण नहीं है कि जज लोया को दांडे अस्पताल क्यों ले जाया गया दूसरे अस्पताल क्यों नहीं ले जाया गया।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जय सिंह ने कहा था कि आदेश केवल मौत के मामले पर दिया जाए और बाकी मामले हाईकोर्ट वापस भेज दिए जाए। प्रशांत भूषण ने कहा था कि जब हमने डॉ. शर्मा की रिपोर्ट सौंपी उसके बाद डॉ. शर्मा पर दबाव डाला गया कि वे स्पष्टीकरण जारी करें। प्रशांत भूषण ने कहा था कि जज लोया की मौत हार्ट अटैक से नहीं हुई थी। उन्होंने कहा था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जहर देने की आशंका है। उन्होंने फोरेंसिक एक्सपर्ट आरके डॉ. शर्मा की राय का हवाला देते हुए कहा था कि उनकी राय जजलोया की रिपोर्ट से विरोधाभासी है। जज लोया के सभी अंग दबाव में थे जिसका कोई कारण नहीं बताया गया। उनकी धमनियां कड़ी हो गई थी। उन्होंने कहा कि अगर धमनियां कड़ी हो जाती हैं तो हार्ट अटैक की संभावना नहीं है। उन्होंने कहा था कि डॉ. शर्मा के मुताबिक अंगों में दबाव का वजह नहीं बताना आश्चर्यजनक है। उन्होंने कहा कि विसरा सैंपल 1 दिसंबर को प्राप्त होता है और उनका एनालिसिस 19 जनवरी तक होता है। उसकी रिपोर्ट 5 फरवरी को बनायी जाती है। सबकुछ असामान्य तरीके से हुआ।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील दुष्यंत दवे ने कहा था कि महाराष्ट्र सरकार की रिपोर्ट में काफी विरोधाभास है और उसकी जांच का आदेश दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि अगर जज लोया की स्वाभाविक मौत भी हुई हो तो जांच का आदेश देना चाहिए। दवे ने कहा था कि इंटेलीजेंस के आयुक्त की रिपोर्ट जांच दोबारा करने को कहता है। जज लोया के शव को उनके घर क्यों नहीं भेजा गया और उनके परिवार को क्यों नहीं सूचित किया गया। राज्य सरकार को इसका विरोध नहीं करना चाहिए। उसे जांच कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि कमरे में कोई जज मौजूद नहीं था।

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