तो खत्म हो जाएंगी ज्यादातर शादियाँ???

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पढ़ने से पहले :- आप इस लेख को एक सामान्य पाठक की तरह पढ़े , इसमे बहुत सी व्याकरण की गलतियाँ हो सकती है , ये लेख रद्दी हो सकता है अगर आप बहुत बड़े बड़े ओर कठिन शब्दो से भरे आर्टिकल पढ़ने के आदि है। मैं ये भी स्पष्ठ कर दूँ की मैं कोई लेखक नही हूँ इसलिए मैं प्रतिबद्ध नही हूँ आपको उच्च स्तर की हिंदी के लेख मुहैया करवाने को 😅 लेकिन आज मैने जो लिखने की कोसिस की है वो अपने आप में बहुत मायने रखता है मेरे लिए । आपकी टिप्पणी मेरे लिए महत्वपूर्ण है।

देश में भले ही कितने ही बड़े मंचो से महिला अधिकारों की बातें की जाती रहें। (वैसे बात होना भी जरूरी है , ये पहला कदम होता है बदलाव की तरफ़) लेकिन जब हम ज़मीनी हकीकत से रूबरू होते है तब कुछ ओर ही सच्चाई सामने आती है। क्योंकि उससे पहले तक हम सिर्फ फेसबुक जैसी सोशल साइट पर उन महिलाओं को ही देख पा रहे होते है जो अपने कम्फर्ट ज़ोन में रहकर नारीवादी बातें करती दिखाई देती है।
हाँ बात करना जरूरी है ओर इसके लिए वो सब बधाई की पात्र भी है , आखिर कहीं तो /कोई तो शरुवात कर रहा है , मैं डिसाइड करूँगा को कोई तो चुनोती दे रहा है।
अपवाद तो खैर हर जगह होते है , यहाँ ज्यादा है , क्योंकि सोशल मीडिया पर हम वही देख पाते है जो सामने वाला दिखाना चाह रहा है। हो सकता है मैं यहाँ महिलाओं की आजादी पर बहुत लिखकर , अपनी बहन को कह रहा हूँ की तुम सिर्फ कमीज कुर्ता पहना करो । ये तो सबको अपनी बातों/कृत्यों के प्रति खुद की ईमानदार जवाबदेही ही तय करनी होगी। दरअसल महिलाओं को कुछ फौरी चीजों को छोड़कर सबको एक ही तरह की समस्याओ का सामना करना पड़ रहा है। ओर इसी से जुड़ी कुछ बातें पिछले कुछ महीनों में मैंने जानी है उनके बारे में उन्ही के बीच रह कर अध्ययन किया है , वो अलग बात है इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नही है ओर ना ही किसी संस्था से इसका प्रमाण पत्र मुझे मिला है ।

पश्चिम उत्तर प्रदेश के 1000 से ज्यादा गांवों में हम गए है ।
पश्चिम उत्तर प्रदेश के 1000 से ज्यादा गांवों में हम गए है । जिनमे हम सैंकड़ो महिलाओं से मिलें ,जिनमे से कोई खेती करती है , बहुत सी महिलाएं आस पास के शहरों में जाकर घरो में साफ सफाई कर अपने बच्चो का पालन कर रही है , बहुत सी महिलाएं ईंट भट्टो पर काम करके परिवार का पेट पाल रही है ।
उन्हें नही पता नारीवादी क्या है वो क्या कहता है , उनको उनके मूल अधिकार नही मालूम , दिनभर लकड़ियां इक्कठी कर चूल्हा फूँकती उन महिलाओं को नही पता की उन्ही के शहर में एक बड़े से सरकारी बैनर पर उन्ही की एक फ़ोटो गैस सिलेंडर के साथ लगी हुई है। वो बहुत दूर है उन तमाम बातों से जिन बातों के केंद्र में वही है।
खैर मैं बता रहा था एक सर्वे के बारे में जो मेरा अपना अनुभव है , उस दौरान मैंने कुछ बिंदुओं पर अलग अलग महिलाओं से बात की ,ओर थोड़े टाइम मे ,जब वो विस्वास में थी ,ओर सहज होकर बात करना स्टार्ट किया तब मुझे बहुत सी ऐसी चीजें जानने को मिली , जिससे मेरे बहुत से भृम एक एक करके टूटते चले गए।

 

2 महीने 100 से ज्यादा गाँव ,10 हजार लोगो
  1. 2 महीने 100 से ज्यादा गाँव ,10 हजार लोगो में किए गए सर्वे के आधार पर अगर कम से कम शब्दो में कहूँ तो :-

अगर बच्चे पैदा करने का निर्णय लेने का अधिकार महिलाओं के पास होता तो #जनसंख्या_नियंत्रण
नामक शब्द भी किताबी होता।
#ग्राउंड_रिपोर्ट :- Lokesh Bhiwani
(कॉपी फ्रॉम फेसबुक पोस्ट)

ये जो लिखा गया है इसकी व्याख्या करने की जरूरत है नही अगर हम इसे 2,3 बार पढ़ेंगे तो ही हमारे मन में वो सब चीजें याद आती जाएंगी जो इससे जुड़ी है।
यहाँ शादी के कुछ महीनों बाद ही बातें शरू हो जाती है की बच्चा कब करोगे ,इतने दिन हो गए अब एक बच्चा तो कर ही लेना चाहिए ।
फिर चाहे वो नई दुल्हन को कही गई सास सुसर की इमोशनल कमेंट्स हो या लड़के को उसकी भाभियों के मजाकिया ताने।
ये सब बातें है जो स्पष्ठ करती है की ज्यादातर बच्चे इसलिए दुनिया में आते है की ,क्योंकि परिवार के बुजुर्ग चाहते है / पति चाहता है / रिस्तेदारों के ताने सहन नही हो पाते (जब शादी के 5,6 साल निकल चुके हो।
अरेंज मैरिज में जब परिवार को चाहिए की लड़की को सहज होने का समय दिया जाए , उससे पहले ही वो उसपर बच्चे के लिए अप्रत्यक्ष दवाब बनाना शरू कर देते है ।

इसीलिए मैंने कहा की निर्णय लेने का अधिकार।

ख़ैर ..जहाँ अमानवीय ओर बद्तर जीवन को स्वीकार किया जा चुका हो वहाँ अधिकार जैसे शब्द बहुत दूर की कोड़ी हो जाते है।

2) पिछले 10 साल के दौरान हुई शादियाँ ।
अगर उन लड़कियों को विस्वास हो जाए की उन्हें सामाजिक जीवन में किसी भी प्रकार से मानसिक प्रताड़ित नही किया जाएगा । परिवार/रिश्तेदार /आसपास के लोग उसके पिछले जीवन को लेकर कोई टिका टिप्पणी नही करेंगे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की 95 प्रतिसत शादियां खत्म हो जाएंगी।
:- Lokesh bhiwani

यहाँ बात अरेंज या लव मैरिज की नही है , बात आपसी सामंजस्यपूर्णता आपसी वैचारिक सहमतियों की है।
आज जब हर रोज प्रेम की नई नई परिभाषाएं गढ़ी जा रही है , उसमे इस युवा पीढ़ी को समझा पाना आसान काम नही है।
इंटरनेट ने युवाओं को समय से पहले समझदार बना दिया है , वो बात अलग है की इंटरनेट से समझदार बने युवा इस बात को नही मानेंगे की वो वैसी ही समझ बना पाए जैसा उन्हें इंटरनेट से मिले कंटेट प्रोवाइडर ने बनाना चाहा , भले ही वो सब लोग सीधे तौर पर एक दूसरे को नही जानते लेकिन विचारों की एक कड़ी ने उन्हें एक दूसरे से जोड़ दिया।
मेट्रो सिटीज की भागदौड़ में प्रेम सिर्फ सेक्सुअल डिजायर्स का आवरण बनकर रह गया है , जहाँ नही पता की हम किसके साथ कबतक है ,
वैसे ये गलत नही है …….!
लेकिन गलत ये है की दोनो में से किसी एक का अपने साथी के प्रति बहुत उम्मीदे कर लेना आगे जाकर मानसिक परेशानियों का कारण बन रहा है।

राहुल ओर प्रिया रिलेशनशिप में आए ,
6 ,7 महीने साथ बिताने के बाद उन्हें लगा की वो अब एक दूसरे के बिना नही रह सकते इसलिए उन्हें अब शादी कर लेनी चाहिए ।
इस दौरान कॉल ओर वट्सप पर घण्टो रोमांटिक बातों का दौर चलता रहा।  इस दौरान प्रिया को एक दो बार महसूस हुआ की राहुल बहुत बार अपने परिवार के बारे में बताने में असहज हो जाता है ,लेकिन प्रिया ने इग्नोर किया की रहना तो राहुल के साथ है ।
शादी हुई , शुरुआत में सब ठीक रहा। लेकिन 7,8 महीनों में ही दोनो के बीच अनबन शरू हो गई  जिसके बहुत से छोटे बड़े कारण थे।
लेकिन सबका मूल यही था की शादी से पहले दोनो में से किसी ने भी एक दूसरे को वैचारिक तौर पर नही जाना , सामाजिक विषयो पर कभी चर्चा नही हुई , परिवार का क्या नजरिया है इसपर कभी चर्चा नही हुई। पहले सिर्फ एक दूसरे की अच्छाइयां ही दिखी , अब बुराइयां नजर आने लगी , वासना पर चढ़ा प्रेम नामक आवरण अब उतरने लगा।
1 साल में ही शादी टूटने की नोबत आ गई ।
इसमे गलती किसकी ? ओर ये कहानीया हमारे ही आस पास घट रहीं है हो सकता है हम ही राहुल या प्रिया में से एक हों ।
खैर ये एक उदाहरण है प्रेम के खोखलेपन का।

समस्याएं ओर भी है ।
जो शादियाँ घरवालों ने करवाई है उनमें भी इसी तरह की समस्याएं है , लेकिन इस केस में लड़कियों को ज्यादा मानसिक दबाव झेलना पड़ रहा है।  एक समय के बाद जब वो शादी नाम के गट्ठर को जबरजस्ती ढ़ोकर थक चुकी होती है , तब भी वो उसको इसलिए नही उतार पाती की ,कितनी मुश्किलों के बाद पिता ने उसकी शादी की है , उन लोगो का जीना मुश्किल कर देगा समाज । कुछ लड़कियों को इसलिए ढोना पड़ता है की अलग होने के बाद उन्हें कोई आर्थिक सुरक्षा नही दिखाई देती ।

मेरा मानना है की अगर लड़कियों को शादी से पहले आत्मनिर्भर किया जाए ओर वो आर्थिक स्वतंत्र हो जाती है तो वो पहले की तुलना में ज्यादा सहज होंगी फैसले लेते समय ।

5 साल की शादी के बाद एक लड़की ने कहा की मैं अलग नही हो सकती क्योंकि मेरे पिता ये सहन नही कर पाएँगे , लेकिन अगर मेरे साथ ऐसा ही रहा तो मेरे पास सुसाइड के अलावा कुछ विकल्प नही बचेगा।।

क्या हमें इसपर गम्भीरता से नही सोचना चाहिए की क्यों किसी लड़की को ऐसा कहने की जरूरत पड़ी , वो क्या कारण है जिसके कारण वो इतने मानसिक दबाव में है की उसे हर रोज नींद की गोलियो का सहारा लेना पड़ता है सोने के लिए।
कहीं वो लड़की हमारे ही घर में तो नही है ,हमारी पत्नी/बहन/माँ कोई भी तो हो सकती है , इसका उम्र से कोई लेना देना नही है।
क्या हमें एक भाई होने के नाते जिम्मेदारी नही बनती की हम अपनी बहन से बात करे बैठकर ,
गाँवो में ज्यादातर होता है की बड़े भाई का मतलब होता है किसी जेल का जेलर की तुम कहाँ जा रही हो /तुमने ये क्यों पहना है/तुम वहाँ क्यू खड़ी थी।
क्या ऐसे माहौल में वो बता पाएगी की उसे क्या समस्या है ।
हमें सोचना होगा ।

क्या हमारे लिए पति होने का मतलब पत्नी की आर्थिक जरूरतों ओर शारिरिक जरूरतों भर को पूरा करना है?
क्या सेक्स के तुरन्त बाद आप करवट लेकर सो जाते है , सोचिए.. क्या इसे पेड सेक्स माना जाए ?
क्या हमें नही लगता की हमें बातें करनी चाहिए उसके बाद ,अपने दिनभर के एक्सपीरियंस शेयर करने चाहिए?
हमने पिछले 1 महीने में कब कुछ सप्राइज गिफ्ट दिया, हमने कब पास के शहर में घूमने का प्लान बनाया ?
ये बातें वो है जो कारण बनती है एक घरेलू महिला के अवसादग्रस्त होने की।

ओर इस हालत में ज्यादातर महिलाएं है , हाँ वो कहेंगी नही , क्योंकि उन्हें डर है समाज का , उन्हें डर है की महिलाएं ही उन्हें कमजोर कहेंगी , उन्हें डर है अपने तथाकथित जिम्मेदारियों से भगोड़ा कहे जाने का ।
सबने स्वीकार कर लिया है , इन स्तिथियों को ।
ओर जब कोई एक कोसिस करेगी इस बारे में कहने की तो उसी की कोई अजीज कह देगी की :- इतना तो चलता ही रहता है हर घर में , ये तो आम समस्या है , किसके घर में नही होती लड़ाइयां।

हाँ वो कहेंगी नही , क्योंकि उन्हें डर है समाज का
हाँ वो कहेंगी नही , क्योंकि उन्हें डर है समाज का

ख़ैर …..इतना तो चलता ही है।

हम बात कर रहे थे की शादियाँ खत्म हो जाएंगी ,
वैसे ये नोबत कभी आएगी नही , क्योंकि समाज तो हमेसा से ही पुरुषप्रधान रहा ही है , अब पुरुषों ने चालाकी दिखाते हुए नारीवाद का झंडा भी थाम लिया है , अब वो नारीवादी आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे है , अब वो महिलाओं को आंदोलित कर रहे है की वो विद्रोह कर दें इन कुरीतियो के खिलाफ लेकिन वो सब अपने कम्फर्ट ज़ोन में रहकर कर रहे है , वो इस आड़ में नारीवाद की सीमाएं तय करना चाहते है । वो हमेसा अपने अहम को ऊंचा रखते हुए आपको प्रेरित करेंगे , वो इस रथ के घोड़े की नकेल पकड़ना चाहते है ताकि युद्ध के समय दिशा निर्देश हम दें।
बहुत ही स्पष्ठ बात है महिलाएं ही है जो महिलाओं को इस स्तिथि से उबार सकती है ,खुद को मुख्यधारा में ला सकती है , हम पुरुषों के फ़रेब में फँसोगी तो सिर्फ भृम रहेगा की तुम शसक्त हो रही हो।

3) इस दौरान मुझे एक भी महिला ऐसी नही मिली जिसका कभी सेक्सुअल हरैसमेंट नही हुआ हो।

यहाँ मैं अपनी पिछली पंक्तियां दोहराना चाहूंगा की

महिलाएं ही है जो महिलाओं की स्तिथि उबार सकती है।

यहाँ सबसे पहले तो यह सबको क्लियर होना चाहिए की हर पुरूष हर महिला के लिए कभी न कभी सेक्सुअल अट्रैक्ट जरूर होता है । ( हो सकता है इस कथन का विरोध किया जाए ,लेकिन अगर हम शांत होकर सोचे तो ये स्वाभाविक है ओर सच्चाई है , हम स्वीकार नही रहे वो अलग बात है ।

तो क्योंकि ये स्वाभाविक है इसलिए इसे गलत नही कहा जा सकता , ये गलत तब होता है जब उस अट्रैक्शन को किसी असमान्य क्रिया में बदला जाए।

तो हम बात वहीं से आरम्भ करेंगे की कोई नही है ऐसी जो कभी इसका शिकार न बनी हो ।

इससे आगे की बात असामाजिक हो सकती है बहुत लोगो के लिए
की गांवों इस तरह की हिंसा का शिकार हुई महिलाओं में 40 परसेंट ऐसी है जिनके साथ उनके सगे ससुर ने ही जबरजस्ती करने की कोसिस की है ।

क्या इसे हम खुले तौर पर स्वीकार करने के लिए तैयार है ?

बाकियो को भी कभी यात्राओं के दौरान तो कभी वर्किंग प्लेस पर तो कभी शिक्षण संस्थानों में इस तरह के बुरे अनुभवों से गुजरना पड़ा है।

शिक्षण संस्थानों ओर सोशल मीडिया से सम्बंधित एक अनुभव :- हमने अपने आस पास के शिक्षा संस्थानों में पढ़ा रहे या उनसे जुड़े समाज के प्रबुद्ध लोग जो फेसबुक पर एक्टिव है ,जो समय समय पर हर तरह के मुद्दों पर अपनी राय रखते है ओर महिला सशक्तिकरण पर विशेष जोर देते है । ऐसे लोगो को हमारी टीम की लड़कियों ने अपनी फेसबुक पर एड किया , एक समय बाद जब वो लोग आपस में सहज हो गए ।
उसके बाद की घटना चोंकाने वाली रही ।
उनमें से आधे से ज्यादा लोगो ने (उम्र 50 के पार) लड़कियों से इनबॉक्स में ठिठोलीनुमा मजाक किए/ कइयों ने बहुत बार वीडियो कॉल की फरमाइश की जबतक उन्हें ब्लॉक नही कर दिया गया/ कुछ ने तो डबल मीनिंग मिम्स भी इनबॉक्स किए।
जिनका मकसद महिला सशक्तिकरण तो नही हो सकता।
(इस दौरान अच्छे लोग भी मिलें जो इनबॉक्स में भी वैसे थे जैसा वो ओपनली दिखते थे)

इससे स्पष्ठ हुआ की ज्यादातर लोग जो सोशल मीडिया पर महिला उत्थान की बातें करते है वो लोग भी कहीं न कहीं मौको का निर्माण कर रहे होते है खुद के लिए। तो ऐसे में वो बात ओर मजबूत हो जाती है की सिर्फ महिलाएं ही महिलाओं को आजादी दिलवा सकती है।

ऊपर जिक्र किए लोगो में से मैं भी एक हो सकता हूँ , वैसे ये सर्टिफिकेट देने का काम मुझसे जुड़ी महिलाएं ही करें तो सही है ।

आज जब महिला दिवस पर बड़े बड़े स्लोगन बनाए जाएंगे , दम्भ भरे जाएंगे की हमने ये किया है हमने वो किया है महिलाओं के लिए ।
तो उन्हें बताना होगा की असल स्तिथि क्या है , क्या समस्या है, क्या कारण है ओर इसका निदान कैसे हो।
नारों से सुधार होता तो आज हमारा देश सुपर पावर होता , लेकिन नही है ।

हो सकता है मैंने जो शेयर किया उसने बहुत सी गलतियाँ हो , हो सकता है मेरे सारे अनुमान ही गलत हो , लेकिन मैंने जो लिखा वो अबतक के अनुभवों के आधार पर लिखा है , इसमे मेरे कोई पूर्वाग्रह नही रहे की ऐसा ही है, आप अपनी बात कह सकते है , हम सीख रहे है , आपसे , आसपास से , सबसे ।
आपकी अनुभवी राय हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

महिला दिवस की शुभकामनाएं ✊✊

Writer :- Lokesh Bhiwani

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