सुप्रीम कोर्ट : मोदी सरकार के लिए झटका, केजरीवाल सरकार की बड़ी जीत, दिल्ली सरकार है असली बॉस

323

सुप्रीम कोर्ट : मोदी सरकार के लिए झटका, केजरीवाल सरकार की बड़ी जीत, दिल्ली सरकार है असली बॉस : चार जुलाई, 2018 का दिन देश की राजधानी दिल्ली के लिए एतिहासिक साबित हुआ, जब दिल्ली के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। बुधवार को पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने अहम फैसले में उपराज्यपाल के पर कतरे हैं तो दिल्ली की चुनी हुई सरकार को प्राथमिकता दी है। तीन जजों की ओर से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआइ) दीपक मिश्रा ने फ़ैसले में कहा कि एलजी के पास सीमित अधिकार हैं। दिल्ली का एलजी अन्य राज्यों के राज्यपालों की तरह ही है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एलजी को मंत्रिमंडल की राय का सम्मान करना चाहिए और उसकी राय पर काम करना चाहिए। दोनों के बीच मतभेद होने पर एलजी मामला राष्ट्रपति को भेज सकते हैं। लेकिन वे ऐसा हर मामले में यांत्रिक ढंग से नहीं कर सकते। ये ज़रूरी होने पर अपवाद के तौर पर हो।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एलजी और दिल्ली सरकार को समन्वय के साथ काम करना चाहिए। काउंसिल ऑफ मिनिस्टर का हर फैसला एलजी को सूचित किया जाएगा, लेकिन उस पर एलजी की सहमति अनिवार्य नहीं होगी। एलजी काउंसिल ऑफ मिनिस्टर की सलाह पर काम करेंगे।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने को लेकर स्थिति साफ कर दी है कि यह संभव नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल को चुनी हुई सरकार के साथ मिलकर काम करना होगा। यही नहीं शीर्ष अदालत ने कहा कि असली शक्ति जनता की चुनी ही सरकार के पास है और जनता के प्रति जवाबदेही भी उनकी ही है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) दीपक मिश्रा ने अपनी टिप्पणी में कहा कि उपराज्यपाल को दिल्ली सरकार के साथ मिलकर जनता के हित में काम करना चाहिए। पुलिस, भूमि और पब्लिक ऑर्डर के अलावा दिल्ली विधानसभा कोई भी कानून बना सकती है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सख्त टिप्पणी ने कहा है कि दिल्ली में किसी तरह की अराजकता की कोई जगह नहीं है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्य के बीच भी रिश्ते बेहद सौहार्दपूर्ण होने चाहिए।

वहीं, संविधान पीठ के अन्य जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि राष्ट्र तब फेल हो जाता है, जब देश की लोकतांत्रिक संस्थाएं बंद हो जाती हैं। हमारे समाज में अलग विचारों के साथ चलना जरूरी है। मतभेदों के बीच भी राजनेताओं और अधिकारियों को मिलजुल कर काम करना चाहिए।

चंद्रचूड ने कहा कि असली शक्ति और जिम्मेदारी चुनी हुई सरकार की ही बनती है। उपराज्यपाल मंत्रिमंडल के फैसलों को लटका कर नहीं रख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है कि एलजी का काम राष्ट्रहित का ध्यान रखना है, उन्हें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि चुनी हुई सरकार के पास लोगों की सहमति है।

राहुल गांधी दिल्ली के पूर्ण राज्य पर अपना रुख साफ करें नहीं तो प्रधानमंत्री बनना भूल जाएं : केजरीवाल

पांच जजों की संविधान पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं।

वहीं, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने फैसले पर कहा कि यह दिल्ली के साथ लोकतंत्र की भी बड़ी जीत है। इस बाबत उन्होंने ट्वीट भी किया है।

इन 7 लाइनों में SC ने समझा दिया उनका अधिकार :
1. उपराज्यपाल याद रखें दिल्ली की सरकार जनता की चुनी हुई सरकार है.
2. विधानसभा के फैसलों के लिए उपराज्यपाल की सहमति जरूरी नहीं है.
3. उपराज्यपाल की भूमिका राष्ट्रहित का ध्यान रखना है.
4. मंत्रिमंडल के फैसले को उपराज्यपाल अटका नहीं सकते.
5. कैबिनेट के साथ मिलकर दिल्ली के उपराज्यपाल काम करें. एलजी का काम दिल्ली सरकार के हर फैसले पर रोकटोक करना नहीं है.
6. उपराज्यपाल सिर्फ सरकार को सलाह दे सकते हैं, बाध्य नहीं कर सकते.
7. हर दिन के काम में बाधा डालना सही नहीं है. संविधान का पालन करना सबकी जिम्मेदारी है.

पांच जजों की संविधान पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं.

  • दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने कहा कि दिल्ली की जनता का एक ऐतिहासिक फैसला था, आज माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण फैसला दिया है. मैं दिल्ली की जनता की तरफ से इस फैसले के लिए धन्यवाद करता हूं, जिसमे माननीय न्यायालय ने जनता को ही सर्वोच्च बताया है. LG को मनमानी का अधिकार नहीं, दिल्ली सरकार के काम को रोका जा रहा था.
  • आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि लैंड, पुलिस और लॉ एंड ऑर्डर सरकार के अधीन नहीं आएंगे. इन तीन विषयों को छोड़कर चाहे वह बाबुओं के ट्रांसफर का मसला या और नई शक्तियां हों, वह सारी शक्तियां अब दिल्ली सरकार के अधीन आ जाएंगी.
  • – मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली के लोगों की बड़ी जीत हुई है. लोकतंत्र के लिए बड़ी जीत है.

दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक मुखिया घोषित करने के हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अपीलीय याचिका में दिल्ली की चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के अधिकार स्पष्ट करने का आग्रह किया गया था।

Supreme Court Verdict On Arvind Kejriwal-Led Delhi Government vs Lieutenant Governor by NDTV on Scribd

सुरक्षित रख लिया था फैसला
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एके सीकरी, न्यायमूर्ति एमएम खानविल्कर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से पेश दिग्गज वकीलों की चार सप्ताह तक दलीलें सुनने के बाद गत छह दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। दिल्ली सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम, पी. चिदंबरम, राजीव धवन, इंदिरा जयसिंह और शेखर नाफड़े ने बहस की थी।

उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार को काम नहीं करने देते
दिल्ली सरकार की दलील थी कि संविधान के तहत दिल्ली में चुनी हुई सरकार है और चुनी हुई सरकार की मंत्रिमंडल को न सिर्फ कानून बनाने बल्कि कार्यकारी आदेश के जरिये उन्हें लागू करने का भी अधिकार है। दिल्ली सरकार का आरोप था कि उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार को कोई काम नहीं करने देते और हर एक फाइल व सरकार के प्रत्येक निर्णय को रोक लेते हैं।

दिल्ली का ‘बॉस’ कौन, केजरीवाल सरकार Vs LG मामले में SC की संविधान पीठ सुनाएगी फैसला

दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है
हालांकि दूसरी ओर केंद्र सरकार की दलील थी कि भले ही दिल्ली में चुनी हुई सरकार हो लेकिन दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। दिल्ली विशेष अधिकारों के साथ केंद्र शासित प्रदेश है। दिल्ली के बारे में फैसले लेने और कार्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार केंद्र सरकार को है। दिल्ली सरकार किसी तरह के विशेष कार्यकारी अधिकार का दावा नहीं कर सकती।

मामूली बातों पर मतभेद नहीं होना चाहिए
दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी भी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उपराज्यपाल और चुनी हुई सरकार के बीच आत्मीय संबंध होने चाहिए। खासतौर पर जब केंद्र और दिल्ली में अलग-अलग पार्टी की सरकार हो। उपराज्यपाल और सीएम के बीच प्रशासन को लेकर सौहार्द्र होना चाहिए।आपसी राय में मतभेद मामूली बातों पर नहीं होना चाहिए।

एलजी के अधिकार राज्य सरकार से ज्यादा
बता दें कि उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक प्रमुख बताने वाले, दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ स्पष्ट कर चुकी है कि केजरीवाल सरकार को स‌ंविधान के दायरे में रहना होगा, पहली नजर में एलजी के अधिकार राज्य सरकार से ज्यादा हैं।

दिल्ली का बॉस कौन?

  • 11 याचिकाएं दाख़िल हुई थीं
  • 5 जजों का संविधान पीठ
  • संविधान पीठ ने फ़ैसला सुरक्षित रखा था
  • हाइकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई
  • हाइकोर्ट ने LG को प्रशासनिक प्रमुख कहा था
  • दिल्ली को विशेष राज्य के दर्जे की व्याख्या
  • अनुच्छेद 239AA के तहत विशेष राज्य

पांच जजों की बेंच 

  1. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा
  2. जस्टिस एक सीकरी
  3. जस्टिस एएम खानविलकर
  4. जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़
  5. जस्टिस अशोक भूषण

 

क्या थे केजरीवाल सरकार के वो 10 तर्क:

1. चपरासी से लेकर अधिकारियों की नियुक्ति ट्रांसफर-पोस्टिंग और उनके खिलाफ कार्यवाही करने का अधिकार नहीं रह गया इसलिए सरकारी मुलाजिम चुनी हुई सरकार के आदेश नहीं मानते.

2. सेवा विभाग उप राज्यपाल के अधीन किए जाने की वजह से गेस्ट टीचर्स को परमानेंट करने और नए शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पाई.

3. सेवा विभाग सरकार के अधीन ना होने से कई नए बनाए गए मोहल्ला क्लीनिक के संचालन के लिए डॉक्टर पैरामेडिकल और नर्सिंग स्टाफ की नियुक्ति नहीं हो पाई.

4. एंटी करप्शन ब्रांच को उपराज्यपाल के अधीन किए जाने के बाद से सरकार भ्रष्ट कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर पा रही जिससे सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा. सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को धक्का लगा.

5. नीतिगत फैसलों पर अमल करने का आखरी अधिकार उपराज्यपाल के अधीन होने के चलते चुनी हुई सरकार कई योजनाएं लागू नहीं कर पाई.

6. CCTV योजना, नए मोहल्ला क्लीनिक बनाए जाने की योजना, सेवाओं की होम डिलीवरी की योजना, राशन की होम डिलीवरी की योजना जैसी कई स्कीम लंबे वक्त के लिए बाधित रहीं.

7. हर फाइल को मंजूरी के लिए उपराज्यपाल को भेजना जरूरी और उपराज्यपाल फाइलों पर लंबे समय तक बैठे रहे.

8. सरकार द्वारा नियुक्त किए गए सलाहकारों और विशेषज्ञों की नियुक्ति को उपराज्यपाल ने खारिज किया जिससे सरकार के काम पर प्रभाव पड़ा.

9. कैबिनेट की सलाह उपराज्यपाल पर बाध्य ना होने से उन्होंने सरकार के नीतिगत फैसले को पलट दिया या खारिज कर दिया.

10. केंद्र सरकार द्वारा शक्ति विहीन और उस पर हाईकोर्ट के आदेशों के बाद चुनी हुई सरकार का दिल्ली में सरकार चलाना मुश्किल हो गया. चुनी हुई सरकार महज़ सलाहकार की भूमिका में रह गई.

केंद्र की दलील

  • दिल्ली में सारे प्रशासनिक अधिकार LG को
  • दिल्ली सरकार को अधिकार दिए तो अराजकता फैलेगी
  • दिल्ली राजधानी है, पूरे देश के लोगों की है
  • केंद्र में देश की सरकार इसलिए दिल्ली पर केंद्र का अधिकार
  • दिल्ली में जितनी भी सेवाएं हैं, केंद्र के अधीन हैं
  • ट्रांसफर, पोस्टिंग का अधिकार केंद्र के पास
  • मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य नहीं LG
  • चुनी हुई सरकार सभी मुद्दों पर LG से सलाह करे
  • दिल्ली में केंद्र अपना शासन चलाए ये अलोकतांत्रिक नहीं

दिल्ली हाइकोर्ट फ़ैसला (4 अगस्त 2016)

  • आर्टिकल 239A के तहत दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश
  • LG ही दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख
  • LG मंत्रिमंडल की सलाह, फ़ैसले मानने को बाध्य नहीं
  • किसी फ़ैसले से पहले LG की मंज़ूरी ज़रूरी
  • अधिकारियों की नियुक्ति, तबादले केंद्र के पास
  • नियुक्ति, तबादले दिल्ली सरकार के अधिकार से बाहर
  • हाइकोर्ट ने सरकार के कई फ़ैसले अवैध क़रार दिए

क्या है संविधान का अनुच्छेद 239AA 

  • दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश
  • दिल्ली की अपनी विधानसभा, अपना मुख्यमंत्री
  • प्रशासक उपराज्यपाल होंगे
  • उपराज्यपाल राष्ट्रपति की ओर से काम करेंगे
  • विधानसभा के पास भूमि, लॉ एंड ऑर्डर, पुलिस अधिकार नहीं
  • सीएम, मंत्रिमंडल की मदद और सलाह से फ़ैसला करेंगे LG
  • कहीं ये नहीं लिखा कि LG सलाह मानने को बाध्य
  • असहमति पर मामला राष्ट्रपति के पास जाएगा
  • राष्ट्रपति का फ़ैसला बाध्यकारी होगा
फटाफट ख़बरों के लिए हमे फॉलो करें फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर और डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App

Leave A Reply

Your email address will not be published.