दिल्ली का ‘बॉस’ कौन, केजरीवाल सरकार Vs LG मामले में SC की संविधान पीठ सुनाएगी फैसला

सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुबह साढ़े दस बजे आएगा, 6 दिसंबर 2017 को पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था

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दिल्ली का ‘बॉस’ कौन, केजरीवाल सरकार Vs LG मामले में SC की संविधान पीठ सुनाएगी फैसला : सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ बुधवार को तय करेगी कि दिल्ली का बॉस कौन है। कोर्ट का फैसला सुबह 10.30 बजे आएगा. दिल्ली के बारे में फैसला लेने की प्राथमिकता किसके पास है दिल्ली के उपराज्यपाल के पास या मुख्यमंत्री के पास। सुप्रीम कोर्ट केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच चल रही अधिकारों की लड़ाई पर अपना फैसला सुनाएगा।

पांच जजों की संविधान पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं. दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक मुखिया घोषित करने के हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। अपीलीय याचिका में दिल्ली की चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के अधिकार स्पष्ट करने का आग्रह किया गया है।

दिल्ली सरकार बनाम उप राज्यपाल के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 11 याचिकाएं दाखिल हुई थीं. 6 दिसंबर 2017 को मामले में पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था.

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के 4 अगस्त, 2016 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें उप राज्यपाल को प्रशासनिक प्रमुख बताते हुए कहा गया था कि वे मंत्रिमंडल की सलाह और मदद के लिए बाध्य नहीं हैं.

दिल्ली का ‘बॉस’ कौन, केजरीवाल सरकार Vs LG मामले में SC की संविधान पीठ सुनाएगी फैसला :

सुरक्षित रख लिया था फैसला :

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एके सीकरी, न्यायमूर्ति एमएम खानविल्कर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से पेश दिग्गज वकीलों की चार सप्ताह तक दलीलें सुनने के बाद गत छह दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। दिल्ली सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम, पी. चिदंबरम, राजीव धवन, इंदिरा जयसिंह और शेखर नाफड़े ने बहस की थी जबकि केन्द्र सरकार का पक्ष एडीशनल सालिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने रखा था।

संविधान के अनुच्छेद 239AA से दिल्ली को विशेष दर्जा :

सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 239AA के तहत दिल्ली को दिए गए विशेष दर्जे की व्याख्या करेगा. संविधान के आर्टिकल 239AA के मुताबिक दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश होगा. जिसकी अपनी विधानसभा और मुख्यमंत्री होंगे. दिल्ली के प्रशासक उप राज्यपाल होंगे जो राष्ट्रपति की ओर से काम करेंगे.

उप राज्यपाल मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की मदद और सलाह से निर्णय करेंगे. (लेकिन इसमें कहीं यह नहीं लिखा है कि वे इनकी सलाह मानने को बाध्य होंगे). अगर उप राज्यपाल और मंत्रिमंडल के बीच किसी मुद्दे पर असहमति होगी तो उप राज्यपाल मामले को राष्ट्रपति के पास भेजेंगे और उनका फैसला बाध्यकारी होगा. दिल्ली विधानसभा के पास भूमि, लॉ एंड आर्डर और पुलिस का अधिकार नहीं होगा.

उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार को काम नहीं करने देते :

दिल्ली सरकार की दलील थी कि संविधान के तहत दिल्ली में चुनी हुई सरकार है और चुनी हुई सरकार की मंत्रिमंडल को न सिर्फ कानून बनाने बल्कि कार्यकारी आदेश के जरिये उन्हें लागू करने का भी अधिकार है। दिल्ली सरकार का आरोप था कि उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार को कोई काम नहीं करने देते और हर एक फाइल व सरकार के प्रत्येक निर्णय को रोक लेते हैं।

 

 क्या था दिल्ली हाईकोर्ट का चार अगस्त 2016 का फैसला : दिल्ली सरकार और राज्यपाल के बीच  अधिकारों के विवाद को लेकर हाईकोर्ट का 194 पेज का फैसला आया था.
1- आर्टिकल 239 ए के मुताबिक दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है.
2- संविधान के अनुच्छेद 239 एए के बाद भी दिल्ली का केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा बरकार.
3- दिल्ली के उप राज्यपाल दिल्ली मंत्रिमंडल के सलाह और फैसले मानने के लिए बाध्य नहीं.
4- दिल्ली सरकार अगर कोई भी फैसला लेती है तो उसे उप राज्यपाल की सहमति लेना आवश्यक है.
5- अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार केंद्र सरकार के पास और दिल्ली सरकार के क्षेत्राधिकार से बाहर
6- केंद्र का 21 मई 2015 का नोटिफिकेशन सही.
7- एसीबी को लेकर केंद्र सरकार का जुलाई 2014 और 21 जुलाई 2015 का नोटिफिकेशन सही. जिसमे एसीबी को केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई न करने की बात कही गई थी. और एसीबी को दिल्ली सरकार के अधीन नहीं बताया गया था.
8- दिल्ली सरकार का CNG फिटनेस स्कैम और डीडीसीए में हुए वित्तीय घोटाले को लेकर बनाया गया जांच आयोग अवैध, क्योंकि उप राज्यपाल की  सहमति नहीं ली गई.
9- दिल्ली सरकार द्वारा तीनों बिजली कंपनियों में नामिनी निदेशकों की नियुक्ति अवैध.
10- दिल्ली सरकार का 12 जून 2015 का डीईआरसी को दिया गया निर्देश अवैध और असंवैधानिक जिसमें कहा गया था कि बिजली कटौती होने पर उपभोक्ताओं को मुवावजा दिया जाएगा.
11- दिल्ली सरकार का 4 अगस्त 2015 का कृषि जमीन का सर्कल रेट बढ़ाने का फैसला अवैध.
12- हालांकि सीआरपीसी में एलजी को विशेष पब्लिक प्रोसीक्यूटर नियुक्त करने का अधिकार है, इस शक्ति का इस्तेमाल मत्रिमंडल की सलाह से होना चाहिए.
दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है :

हालांकि दूसरी ओर केंद्र सरकार की दलील थी कि भले ही दिल्ली में चुनी हुई सरकार हो लेकिन दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। दिल्ली विशेष अधिकारों के साथ केंद्र शासित प्रदेश है। दिल्ली के बारे में फैसले लेने और कार्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार केंद्र सरकार को है। दिल्ली सरकार किसी तरह के विशेष कार्यकारी अधिकार का दावा नहीं कर सकती।

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मामूली बातों पर मतभेद नहीं होना चाहिए :

दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी भी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उपराज्यपाल और चुनी हुई सरकार के बीच आत्मीय संबंध होने चाहिए। खासतौर पर जब केंद्र और दिल्ली में अलग-अलग पार्टी की सरकार हो। उपराज्यपाल और सीएम के बीच प्रशासन को लेकर सौहार्द्र होना चाहिए।आपसी राय में मतभेद मामूली बातों पर नहीं होना चाहिए।

दिल्ली का 'बॉस' कौन, केजरीवाल सरकार Vs LG मामले में SC की संविधान पीठ सुनाएगी फैसला
दिल्ली का ‘बॉस’ कौन, केजरीवाल सरकार Vs LG मामले में SC की संविधान पीठ सुनाएगी फैसला
केंद्र की दलील :

केंद्र सरकार की ओर से पेश ASG मनिंदर सिंह ने कहा कि दिल्ली में सारे प्रशासनिक अधिकार LG को हैं. अगर दिल्ली सरकार को ये अधिकार दिए गए तो अराजकता फैल जाएगी. केंद्र सरकार ने कहा कि दिल्ली देश की राजधानी है और ये पूरे देश के लोगों की है. केंद्र में देश की सरकार है इसलिए दिल्ली पर केंद्र संपूर्ण अधिकार रखता है.

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दिल्ली सरकार ही दिल्ली है, ये नहीं कहा जा सकता और इसका फैसला सिर्फ केंद्र सरकार ही ले सकती है. उदाहरण के लिए दिल्ली सरकार कल को किसी पद पर केवल बिहार के लोगों की ही भर्ती करे तो स्थिति कैसी होगी? इससे अव्यस्था पैदा होगी. केंद्र सरकार ने कहा कि कल को 26 जनवरी की परेड की जगह दिल्ली सरकार बदलने की बात करने लगे तो हालात क्या होंगे?

केंद्र ने कहा है कि दिल्ली में जितनी भी सेवाएं हैं वे केंद्र के अधीन हैं. केंद्र के पास उसके ट्रांसफर, पोस्टिंग का अधिकार है और ये पूरी तरह से केंद्र के अधीन है. उप राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह को मनाने के लिए बाध्य नहीं हैं. मंत्रिपरिषद कोई भी विधायी फैसला लेने से पहले उप राज्यपाल को सूचित करेगी और मंजूरी के बाद फैसला लेगी. फैसले के बाद फिर उन्हें बताएगी. चुनी हुई सरकार सभी मुद्दों पर उप राज्यपाल से सलाह मशविरा करेगी. यह अलोकतांत्रिक नहीं है कि केंद्र सरकार दिल्ली में अपना प्रशासन चलाए.

एलजी के अधिकार राज्य सरकार से ज्यादा :

बता दें कि उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक प्रमुख बताने वाले, दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ स्पष्ट कर चुकी है कि केजरीवाल सरकार को स‌ंविधान के दायरे में रहना होगा, पहली नजर में एलजी के अधिकार राज्य सरकार से ज्यादा हैं।

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1 Comment
  1. Govind says

    Who is the boss of Delhi?

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